Soulgasm

To Quill the Mocking World

‘गर तू मेरा शिवालय बन जाए …

Poetry, Shantanu Jain
(3 min read)

प्रेम सिंधु का तुझसे आदि,
तू गोधूलि, तू ही निशांत।

February 25, 2017 · 4 Comments

अल्मोड़ा

Non-fiction, Shantanu Jain
(5 min read)
‘सन्नाटा’ शब्द मेरे लिए भयावहता का शब्द-चिह्न है और ‘शांति’ मेरे लिए सुकून का पर्याय है

December 25, 2016 · 9 Comments

किताबें, कॉफ़ी, और कहानियां

Poetry, Shantanu Jain
(4 min read)
एक सन्नाटा सा पसरा हुआ है !
खौफ़ वाला सन्नाटा नहीं –
सुकून वाला सन्नाटा !

October 29, 2016 · Leave a comment

गली खत्रियान , अबुपुरा , मुज़फ्फरनगर

शांतनु जैन
(3 मिनट) खुला आँगन , खुले आँगन में पसरी धूप , एक कोने में ऐंठा – सा खड़ा हरे रंग का हैंडपंप, बाईं ओर से ऊपर जाने वाला चौड़ा जीना, उस चौड़े जीने की गहरी लाल सीढ़ियां और ….

September 17, 2016 · 1 Comment

निशाचरणी

Poetry, Shantanu Jain
(3 min read)

स्वप्न – लोक में हृदय नहीं रमता –
पर तुम ब्रह्माण्ड तरा जाती।
तुम अभिरामि , तुमको मैं निहारूँ –
ऐसा सम्मोहित कर जाती।

June 25, 2016 · 6 Comments

मैं लिखता क्यों हूँ

Non-fiction, Shantanu Jain
(5 min read)

मन की सुनूँ और सुनकर गौर करूँ तो पाता हूँ कि जहाँ तक मेरी बात है, मैं तब लिख पाता हूँ जब हृदय की आर्द्रता अपने गागर को पार कर जाती है।

May 6, 2016 · 1 Comment

डायरी के पन्नो से (2)

Poetry, Shantanu Jain
3 min read

सीढ़ियों के पास-
उस बौराई पवन से –
आलिंगन की चाह में –
खुला मन और खुली बाहें –
एक कल्पना संजो रही थी !

April 16, 2016 · Leave a comment

डायरी के पन्नो से

शांतनु जैन
(3 मिनट)

वही खूबसूरत – सा डर –
वही खूबसूरत – सी दहशत –
फिर से महसूस करना चाहता हूँ !

April 2, 2016 · Leave a comment

आ जाते जो तुम एक बार !

शांतनु जैन
(3 मिनट)

खिल जाती गली -गली कली -कली,
आ जाते जो तुम एक बार !

February 13, 2016 · Leave a comment

बाबा

By Shantanu Jain
(7 min read)

भुलाये नहीं भूलता उनका वह हृदयग्राही रूप जब सूट-बूट पहने , करीने से टोपी मफलर लगाये वह चौक में जाने के लिए तैयार होते थे और छोटी – सी आयु के यह कहने पर कि – बाबा, काला टीका लगा लो , कहीं आपको नज़र न लग जाये – वह आयु को गले से लगा लेते थे और निहाल हो जाते थे – इतने ‘हैंडसम ‘ थे मेरे बाबा !

January 23, 2016 · 5 Comments

वजूद

शांतनु जैन
(3 मिनट)

और तब –
तब लगता है , मानो –
तू है !

December 19, 2015 · 1 Comment

मलंग

शांतनु जैन
(3 मिनट)

बस चाहा –
खो जाऊं कहीं –
अपनी ही रूह में !
गुम हो जाऊँ –
अपने ही ज़हन में !

December 12, 2015 · 2 Comments

तक़दीर

शांतनु जैन
(5 मिनट)

राह चलते हुए ,
बहुत सोच समझकर ,
ध्यान से –
पाँव रखता हूँ !

November 14, 2015 · 2 Comments

तेरी तलाश

शांतनु जैन
(3 मिनट)

अक्सर ,
उस अनजान शख्सियत का ,
चेहरा
खोजने की कोशिश करता हूँ

October 31, 2015 · 5 Comments

मणिकरण

शांतनु जैन
(5 मिनट)

बरबस ही नज़र पड़ गई उस पहाड़ की फुनगी पर ! कुछ … न, पूरी धुंधली – सी थी जब सो कर उठा। और अब, चमक रही थी उषा की उस लालिमा में।

October 24, 2015 · 2 Comments

आधी अधूरी तमन्नायें

शांतनु जैन
(5 मिनट)

वहां …
… जहाँ सिर्फ ‘मैं’ हूँ ,
न कोई बंधन , न कोई राग !

October 10, 2015 · 1 Comment

प्रणय (२/२)

शांतनु जैन
(5-10 मिनट)

पत्थर बनी क्रिया ने एक महीने बाद एक मुड़ा – तुड़ा कागज़ का टुकड़ा लाकर यथार्थ के हाथों में दिया और इतने सालों में पहली बार चली गयी , वह भी दो मिनटों में ! आज न हवा चली , न उसके बाल उड़े , न वह गुनगुनाई , न ही कुछ कहा !

September 5, 2015 · 1 Comment

प्रणय (१/२ )

शांतनु जैन

यूँ तो वह आम दुनिया की परिभाषा अनुसार इतनी सुन्दर नहीं थी , पर एक अलग सा आकर्षण था उसमें , उसकी उन आँखों में , उसकी आवाज़ में जिसने अनायास ही यथार्थ को आकृष्ट कर लिया था। क्रिया ही उसके लिए वह एकमात्र सावन का टुकड़ा थी।

August 15, 2015 · 3 Comments

खोया खोया चाँद

By Shantanu Jain.

आज फिर,

अपने नीड़ को जाती गौरैया –

– चहचहाना भूल गयी !

August 1, 2015 · 2 Comments

ख्वाहिश

By Shantanu Jain.

आज मेरी नींद ने ….

चुपचाप …

आसमान की काली चादर से

एक तारे को तोड़ा –

July 25, 2015 · 3 Comments

ज़िन्दगी के ताने बाने (३/३)

By Shantanu Jain.

किसी के लिए ज़िन्दगी शुरू से आखिर तक एक कोरा कागज़ ही रहती है जिसे किसी लिपि से सजाने का , किसी रंग से भरने का वह “कोई” बहुत मशक्कत करता है और अंत में ज़िन्दगी के सामने घुटने टेक देता है ।

July 11, 2015 · Leave a comment

ज़िन्दगी के ताने बाने (2/3)

By Shantanu Jain

कितनी अजीब है ये ज़िन्दगी – कब किस के लिए जीना शुरू कर देती है और कब किसको भुला देती है – कोई नहीं जान पाता !

July 4, 2015 · 2 Comments

ज़िन्दगी के ताने बाने (1/3)

By Shantanu Jain

और जवाब … जवाब ढूंढते – ढूंढते हम न जाने कितनी ही राहें , कितने ही नुक्कड़ , कितने ही झरोखे पार कर जाते हैं।

June 27, 2015 · Leave a comment

उस रात की बात !

By Shantanu Jain

आज की शब कुछ अलग सी थी …

कुछ सकुचाई – सी … कुछ अलसाई – सी …

June 20, 2015 · 4 Comments

तेरी परिभाषा

By Shantanu Jain

Reminiscences From My Diary …

कभी मस्जिद से आती अजान की आवाज़ है वह ,

वही मंदिर का शंख भी !

June 6, 2015 · 7 Comments

मन भिगोती एक शाम …

Reminiscences from my diary.
By Shantanu Jain.

घड़ी पर नज़र गयी , देखा आठ बज गए थे। अभी कुछ ही देर पहले तो साढ़े पांच बज रहे थे। थकता नहीं समय भी भागते – भागते।

May 29, 2015 · 4 Comments

कांच के उस पार …

Reminiscences from my diary
By Shantanu Jain

मेरे और सलिल में , बस …
काँच भर का फासला था !

एक ओर , मैं –
औपचारिकता के लिबास में लिपटा –
सभ्यता का मुखौटा लगाए –
बैठा हुआ था –

May 16, 2015 · 12 Comments

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