Soulgasm

To Quill the Mocking World

अच्छा लगता है


Poetry, Minakhi Misra
(3 min read)

 

 

room-old-house-waste-things-abandonment

 

सालों बाद घर वापस आना अच्छा लगता है।

काएं-काएं करती उस दरवाज़े से फिर गुज़र जाना अच्छा लगता है।

 

 

अच्छा लगता है बंद खिड़कियों से यादों का पर्दा हटाना

चटकते रौशनी में फिर आँखें टिमटिमाना अच्छा लगता है।

कोई कहे उड़ते इन धूल के बादलों से कि इतना न नाचें

हमें भी ज़मीन पर पैरों का छाप छोड़ जाना अच्छा लगता है।

 

 

अच्छा लगता है सोफे पे बिछी काली चद्दर को सहलाना।

उसपे चढ़ी मकड़ी का रेशम उतारना अच्छा लगता है।

याद है कैसे दादी पके टूटे बाल चुनती थी कम्बल से?

उन बालों के बदले कॉटन कैंडी का मिल जाना अच्छा लगता है।

 

 

अच्छा लगता है आज भी कुँए पे जिंजर म्याऊ को पाना।

उसका मुझे देख नाराज़ हो जाना अच्छा लगता है।

गिर चुकी हैं सारी पत्तियां आम के उस पेड से मगर

फसी पतंग का हवा में फिर उड़ जाना अच्छा लगता है।

 

 

अच्छा लगता है खामोशी से वह खाली झूला झूलाना

उसपे बंधे रबर-बैंड का वह खींचना-खींचाना अच्छा लगता है।

अरे! इस होली के पिचकारी से उस रात कि शरारत का पूछो

गालों में फिरसे गरम रंग का आजाना अच्छा लगता है।

 

—————————-

 

(Image credits)

 

Minakhi is a core team author at Soulgasm. Read his other posts here.

(Click here to read our first book “Mirrored Spaces” : A poetry and art anthology in English and Hindi with contributions from 22 artists)

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This entry was posted on March 11, 2017 by in Poetry and tagged .

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