Soulgasm

To Quill the Mocking World

डब्बे


Poetry, Minakhi Misra
2 min read

minakhi-poem

पूरी रात डब्बे ढो रहा हूँ।
जाने का वक़्त आया तो समझ नहीं आ रहा था
क्या लूँ और क्या छोड़ जाऊं।
चार सालों का बोझ महसूस हो रहा था दिल पर।
कपडे तक कफ़न लग रहे थे।
सारे पुराने कपडे एक डब्बे में भर दिए फिर –
काफी गरीब भिकारी मंदिर के बाहर बैठते हैं।
रात को जब सारे सो रहे थे, डब्बा छोड़ आया वहाँ।

एक सूट लिया था किसी ज़माने –
दर्ज़ी से ख़ास सिलवाया था हर कोने का नाप देकर।
नया नया सा था तो बदन पे यूँ लिपटता था
जैसे इंटरनेट पे मिली कोई काल्पनिक गर्लफ्रेंड
असलियत में दीवार के छिपकली से डरके चिपक रही हो।
आज तो बटन भी उसके लग नहीं रहें थे –
पार्टीओं के बुफे में कुछ ज़्यादा ही प्यार समेट लिया शायद।
जूनियर लोगों को मेल डाला था –
अमीर भिकारियों की कोई कमी नहीं है यहाँ।

गद्दा भी अब पिचक चूका था –
नजाने कितनी अकेली रातों का बोझ संभाला था उसने।
कुछ दाग तो अब छूटने भी नहीं वाले थे।
आख़िर बहुत रातें चाय पीकर बिताई हैं उसपर।
वही चायवाला कह रहा था – सौ रूपए देगा उसका।
तकिया और बेडशीट के साथ एक डब्बा बाँध भी लिया था।
पर गेट से जैसे ही बहार निकला,
भुट्टे बेचने वाली बुड्ढी अम्मा सोते दिख गयी कोने में।
उसी के बगल में छोड़ आया।

फिर बचे थे बिखरे कागजों के वह बंडल –
अब कौनसे तकिए के नीचे रखता उन्हें?
प्रोफेसर लोगों की बात तो कभी नोट नहीं की,
हर क्लास में एक नया सपना ज़रूर दर्ज कर लिया उन में।
वह अनसुने लेक्चरों की विरासत किसको सौंपता?
साथ भी तो नहीं ले जा सकता था-
कहाँ घूमते फिरते कवी बनने का ख़्वाब पाला था
और कहाँ फिर एक कॉलेज में पिसने जा रहा हूँ।
उन नज़्मों के बीज अब नए कॉलेज में नहीं बोने थे।
वरना एक डब्बा वहाँ भी भर जाता –
हर दो साल सपने नहीं दफ़नाने थे, भाई।
चायवाले को ही दे आया जाकर-
भजिये खाते खाते किसीका मन बहल जायेगा।

बस यह एक डब्बा बच गया है –
बस यही असली साथी हैं मेरे।
नावेल वगेरा तो सारे चाट लिए हैं,
पर यह सिविल इंजीनियरिंग की पोथियाँ पड़ी हैं।
चार सालों में जो क़िताबें खोलीं नहीं थीं
कल उन सबको एक बार तो सूंघ लिया है।
कुछ पर से तो पन्नी तक नहीं हटाई थी,
कल मगर बालकनी के धुप में चंद सफ़हे पढ़ लिए –
नजाने फ़िर कब इनको सांस लेने का मौका मिलेगा।
एक कबर्ड नया लेना पड़ेगा इनको क़ैद करने –
कहाँ डब्बे में सड़ते रहेंगे।

ऑटोवाला आगया लगता है।
आस पास सब दोस्त तो पहले ही निकल गए हैं –
टा-टा बाय-बाय का झंझट नहीं होगा।
चलो अब बोरिया बिस्तरा समेट लेता हूँ।
एक आखरी डब्बा यह भी उठा लेता हूँ।
यार, अभी यह डब्बा इतना भारी क्यों लग रहा है?
क्यों लग रहा है की दिल पे अभी भी एक बोझ है?
खुदके आँचल में बाँध के इन किताबों को,
कहीं मैं उनके सपने भी तो नहीं गाढ़ रहा?
इनका भी तो मन करता होगा कि कई लोग पढ़े इनको –
इन्हें कांच के पीछे अनारकली क्यों बना रहा हूँ?
लगता है साथ इनसे भी छूटने वाला है –
ऑटोवाले को लाइब्रेरी का रास्ता बताना पड़ेगा।


(Image credits)

Minakhi is a core team author at Soulgasm. Read his other posts here.

(Click here to read our first book “Mirrored Spaces” : A poetry and art anthology in English and Hindi with contributions from 22 artists)

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One comment on “डब्बे

  1. Shantanu Jain
    February 26, 2017

    Behad se bhi behad umda, Minakhi. Myriad emotions, be it nostalgia,or pain or remorse or craving, woven so intricately that anyone can relate to these words….anyone can be tearful!

    Beautiful!

    Like

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This entry was posted on February 11, 2017 by in Hindi, Poetry and tagged .

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