Soulgasm

To Quill the Mocking World

लैंप बुझ चुका है


Utkarsh Tripathi
(3 min read)

'Katherine' - Another November

‘बदन पर सिसकियों के दाग,

चहरे पर भटकी हुई सी नमी,

सर पर आड़ है घूँघट की मेरे,

मेरे अरमान जो कभी मेरी थपकियों से जाग जाते थे,

आज उस संदूक में ताले के भीतर हैं,

कुछ दबे हुए,

पीछे को सटे हुए,

धूल में पटे हुए ,

मेरे अरमान निशब्द

मेरी क्रूरता का प्रमाण देते हैं!

मेरी आँखों के कुछ नीचे,

निरंतर रिसाव से शायद

एक शैवाल सी जम गयी है,

और अब मुझे काजल लगाने की ज़रुरत नहीं पड़ती

मुझे इन एडियों में उभरी दरारों का कोई दुःख नहीं,

दरारों की चपेट में अब रिश्ते भी आ गए हैं

मलाल ये है की इन्हें भरने बाज़ार में कोई क्रीम नहीं आती

कमरे में एक लैंप है,

जो ख़ुद भी इस बात का फैसला नहीं कर पा रहा की

जल उठे, और रोशन कर दे

अपने आस पास की अँधेरी रुदाली

या बुझ जाए और सदा के लिए शून्य में दाखिल हो

बिस्तर तलाश रहा है उन सिलवटों को

जो आ जाया करती थी कभी भूल से

काफी दिन हो गए सिरहाने के कवर बदले भी

ये सियाह शैवाल, ये दरारें, ये सिलवटें, ये सिरहाने

मेरी शिकस्त के गवाह है,

मेरी हार हुई ही,

मेरी हार हुई है, ज़िम्मेदारियों से

मेरी हर हुई है नातेदारियों से

मेरी हार हुई है, ख़ुद से

लैंप बुझ चुका है

और कहीं कोई जीत गया है!’


Utkarsh is a Guest author at Soulgasm.

(Click here to read our first book “Mirrored Spaces” : A poetry and art anthology in English and Hindi with contributions from 22 artists)

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4 comments on “लैंप बुझ चुका है

  1. Rohit Nag
    November 13, 2016

    Perfect….i read it 4 times

    Liked by 1 person

  2. Prasu Jain
    November 14, 2016

    Waah!

    Liked by 1 person

  3. Shantanu Jain
    November 15, 2016

    Jitna bhi aapko padha hai, un sab mein in panktiyon ne hamara mann jeet liya. bahut bahut bahut sundar!

    Liked by 1 person

  4. sonidivya
    November 20, 2016

    Bhai behtareen

    Liked by 1 person

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This entry was posted on November 13, 2016 by in Hindi, Poetry and tagged .

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