Soulgasm

To Quill the Mocking World

मेरे मन को एक – तलकनामा


By Anchita Bubna
(4 min read)

क्यों कभी कभी ऐ मन,
रूठने को जी करता है …
ख़ामोशी भरे लफ़्ज़ों को
आंसू में बहाने को जी करता है,
टूटने को जी करता है,
हारने को जी करता है ….

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खुदा नहीं, इंसान बनने को जी करता है …
कमज़ोरियों को ऐ यार
अपनाने को जी करता है …

रोने को जी करता है, बहने को जी करता है !!

कि, वो दर्द भरी पुकार से,
मुकम्मल तक,
पर्वत हिला देती है !
इंसान ही क्या, इंसानियत ही क्या,
खुद खुदा को रुला देती है !

यार मेरे, कभी कभी,
तुम्हारे कन्धों पे
सर रख के रोने को जी करता है …
गले लगा के
आह ! करने को जी करता है …

कि, ऐ खुदा तू बता,
खा खुदा की सौगंध!
खुद तेरा फरिश्ता तुझे पुकारता है …
कभी कभी तो, तू खुद इंसान को खोजता है …

तू, खुद रोता है
तरसता है

कि, कभी कभी ऐ मन,
फरिश्ता नहीं,
इंसान बनने को जी करता है …
यार मेरे, तुझे गले लगाने को जी करता है …
ऐ दिल मेरे,
रोने को जी करता है …………………….


(Image credits)

Anchita is a guest author at Soulgasm.

(Click here to read our first book “Mirrored Spaces” : A poetry and art anthology in English and Hindi with contributions from 22 artists)

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One comment on “मेरे मन को एक – तलकनामा

  1. Shantanu Jain
    February 26, 2017

    khoobsurat shabdon mein piri ek khoobsurat kavita. 🙂

    Like

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This entry was posted on October 15, 2016 by in Hindi, Poetry and tagged .

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