Soulgasm

To Quill the Mocking World

गीली लकड़ियाँ


मनी महेश गर्ग

आओ साथ बैठकर कुछ किताबें पढ़ते हैं
कुछ जीवन की धार खोजते हैं
और आत्मा का सार जानते हैं !

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देखो इन गीली लकड़ियों से
सिर्फ धुंआ निकल रहा है
और आग की दीवारों पर
धुँए की काई लिपटी है
आओ इस आग को
कुछ आग देते हैं !

 

इन सर्दियों की आहट में
सब शांत बैठे हैं, सब तरफ सन्नाटा है
और सारे अणु चुपचाप बैठे हैं
कुछ किताबों से बातें करते हैं
और कुछ एक दूजे की बातें करते हैं
इस गरम चादर में
पैरों को ढक कर !

 

आओ बहुत दिनों से तुम्हे
यूँ इत्मिनान से देखा नहीं
बाहर गिरी बर्फ की तरह
मन जमा पड़ा है
तुम आ जाओ तो शायद
इससे जमुना निकल आये

 

सर्दियों की बुदबुदाहट है 
किताबो का बालन है 
और हमारी साँसों की हवा है 
आओ! थोड़ी सी आग पीते हैं 
आज चाय की चुस्कियों से 
गरमाहट नहीं आएगी   
———————————————————————————-
(Image credits: Pratik Patil)

 

Mani
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3 comments on “गीली लकड़ियाँ

  1. Free Spirit- Abhishek
    August 22, 2015

    nothing could be more beautiful than these lines.
    Keep blogging

    Like

  2. Shantanu Jain
    August 22, 2015

    I second Abhishek. One of the most beautiful poems I have ever read! Reading it again and again. Please keep blogging.
    “आओ इस आग को
    कुछ आग देते हैं !” – falling short of words to appreciate your style of writing!

    Like

  3. Deepak Singh Salhipore
    September 2, 2015

    Aao Mani babu ko kuchh vote dete hain !!

    Like

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This entry was posted on August 22, 2015 by in Hindi, Poetry and tagged .

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