Soulgasm

To Quill the Mocking World

‘दो आँखें’


By Somya Tewari

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दाँयी ने पलक झपका के जतला दी शरारत,
बाँई ने चढ़ा के त्योरी तकरार का इशारा किया.
एक अभी उलझन में थी, दूजी ने हाँमी भर भी दी.

बाँई में आ गिरा था जब कुछ, दाँयी ने आँख चुराई थी.
दाँयी को मिर्ची लगने पर फिर, बाँई ने खूब खिल्ली उड़ाई थी.
जाने किस नाते से निभती थी, क्या उनको बाँधे रखता था?
देख भी एक-दूजे को बस आइनों में पायी थीं.

सपने भी अलग देखती थीं दोनों,
एक सूरज से दिल लगा बैठी थी, दूजी चाँद से गप लगाती थी.
और इसी झड़प में दोनों दिन-रात जागती थीं.
फिर संग सोने की खातिर, अमावस की दुआ माँगती थीं.

मेरी तरह आँखों को भी अकेले नींद नहीं आती शायद.
एक आँख कभी अकेली सोयी है भला?

(Art credits: Somya Tewari)

Somya Assorted

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This entry was posted on July 18, 2015 by in Hindi, Poetry and tagged .

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