Soulgasm

To Quill the Mocking World

पड़ोसी


By Somya Tewari
 
बड़े दिनों बाद आज वो ही आनंद आ रहा था, जो अपने कस्बे में आया करता था. इतने बड़े शहर में आने के बाद आज पहली बार अपने कस्बे और शहर के बीच कोई समानता महसूस हुई थी. कारण सीधा सा था. India – Pakistan  का मैच था और घर पहुँचने में देर हो गयी थी. शहर हो या कस्बा, ऐसे matches  का इंतज़ार हफ्तों पहले से ही शुरू हो जाता है. राष्ट्रीय दिवस जैसा एहसास लेके आता है ये दिन जब हम मन की सम्पूर्णता के साथ स्वयं को एक छुट्टी का अधिकारी मानते हैं और office  भी नीयत की द्रृणता के साथ स्वयं को हमारा कर्ज़दार मान बैठता है.
 
ऐसा ही था वो दिन, और लेट होने के कारण मैं किराने की एक दुकान में black and  white TV के सामने अपना मुख चिपकाए कोई 10 – 15 और लोगों के साथ चाय और बिस्कट का सेवन कर रहा था. इस दिन कोई अजनबी नहीं होता, सब अपने निजी होते हैं. मुझे हैरानी हो रही थी की बड़े शहरों में जहाँ अक्सर आपको अपने पड़ोसी की शकल का भी अंदाजा नहीं होता, वहाँ एक दिवसीय match वाले दिन सब जैसे बिछड़े हुए यार बन जाते हैं. यदि कुम्भ के मेले के तुरंत बाद एक  India – Pakistan मैच करा दिया जाए तो जाने कितने बिछड़े दोस्त बिना bollywood की picture बने ही मिल जाएँ. इस दिन तो दुकानदार भी रोज़ से थोड़े कम business minded हो जाते हैं और पाँचवी के बाद छटी चाय मुफ्त दे देते हैं.
 
Padosi_Pic
 
Match की पहली innings समाप्त हो चुकी थी. भारत अब बल्लेबाज़ी कर रहा था. 326 का score chase  करना था और हम काफी बल्लेबाज़ गँवा चुके थे. Commentators का कहना था की ऐसा दबाव या कि pressure के कारण हुआ था. इसका ये अर्थ भी निकाला जा सकता था की इसमें पाकिस्तान के खिलाड़ियों का कोई योगदान नहीं था, और न ही उनकी काबिलियत थी. काश ये दबाव नाम का खिलाड़ी हमारे खेमे में होता.
 
खैर, हर गेंद के साथ दर्शकों में जीत के प्रति निजता और अपने पडोसी मुल्क़ के प्रति गैर-निजता में इजाफा हो रहा था. हर दर्शक के हाथ में मानो बल्ला था और वो स्वयं ही गेंद का सामना कर रहा था. मैच ऐसी स्थिति में आ पहुँचा था कि एक भी विकेट गिरने पर भारत को बोहोत तकलीफ होने वाली थी. हम सब के कान “और ये BSNL  चौक्का, connecting  India” सुनने को तरस गए थे. गेंद बल्ले का बाहरी किनारा तो ले रही थी पर न जाने क्यों सीमा रेखा के बाहर जाने से इंकार करती थी. Commentators  अब इसका दोष Pressure के साथ साथ अनुभव कि कमी पर भी डालने लगे थे. इसी तनाव या की प्रेशर का असर हर दर्शक की कसी मुट्ठियों, चढ़ी हुई भवों, और टेबल पर कठोरता से पटकी जाने वाली प्यालियों में दिख रहा था. कम से कम प्रेशर और प्यालियों के टूटने के बीच का रिश्ता तो मैं समझ ही गया था.
 
कुछ over और निकल गए. कोई खिलाड़ी आउट तो नहीं हुआ था, पर रन भी नहीं बने थे. और इधर रन बनाएँ या विकेट बचाएँ इस असमंजस में अनुभवी खिलाड़ियों कि टोली से भरी किराने की पूरी दूकान झुँझलाने लगी थी. वहाँ बैठा हर बल्लेबाज़ पडोसी मुल्क़ की टीम पर ताने कस रहा था, उनको खेल की भावना के विरूद्ध होने का दोषी ठहरा रहा था और उनकी हर गेंद को झाँसा बता रहा था. धीरे-धीरे वो किस्सा बस गेंद और बल्ले का न होकर बन्दूक और गोली का हो गया. वहां बैठे सभी देशभक्त बल्लेबाज़ अपने आप को सरहद के सिपाही में तब्दील किये देते थे. मैं भी उसी सेना की टुकड़ी का एक जाँबाज़ सिपाही बन बैठा था.
 
TV पर उनकी हर गेंद, और यहाँ सरहद पर हमारे मुख से गालियों के कारतूस से लैस एक और बल्ला.
 
एक एक कर सारे भारत पाकिस्तान सम्बन्धी मुद्दों का वहां post-mortem होता गया, मानों क्रिकेट के मैदान पर नज़दीक आती हार को हम इन मुद्दों से और सरहद पर हर बार लहराए अपने परचम से जीत में तब्दील कर देंगे.
 
मुल्कों की तकरार से भी जब रनों की गति बढाना संभव न हुआ तो हमने अपना तुरुप का इक्का सामने कर दिया. हम मज़हब पर लड़ने लगे. सारे मुसलमानों को तड़ीपार कर भारत को जीत दिलाने की कोशिश करने लगे. अपनी क़ौम को अपने में आता देख शायद हमारा पड़ोसी मुल्क़ अपनी क्रिकेट की जीत का सौदा हमसे कर ले ये सोच कर हमने ज़ोर-शोर से खूब रोष-लिप्त मन्त्रों का उच्चारण किया. दुकान पर बैठे कुछ मुस्लिम भाइयों से हमारी कहा-सुनी भी हो गयी, दुकानदार ने umpire बन के गर्मी शांत करने का भरसक प्रयास किया पर भारत की कम होती गेंदों, और बढ़ते दबाव ने माहौल को ठंडा होने नहीं दिया.
 
पडोसी मुल्क़ और उसकी कौम को अभद्र करार देते हुए हम उन मुस्लिम भाइयों पर चढ़ गए. हाथ-पायी की नौबत देख umpire  घबरा गया. वो बाकी दर्शकों से विनती करने लगा की उसकी दुकान बचा लें. उसने TV बंद कर दिया और अपनी फ्री चाय की दुहाई देते हुए हमें उलझने से रोकने की जद्दोजहद करने लगा. उसको third umpire की ज़रूरत महसूस होने लगी.
 
इधर हम आग-बबूला हुए जाते थे और उन गैर-क़ौम के लोगों को अपने आवेश का शिकार बनाने को तत्पर थे. मैदान पे न सही पर कम से कम कहीं तो कलाइयों का बेहतरीन प्रयोग हम कर ही सकते थे. हमने पड़ोसी मुल्क़ की तमाम बदसलूकियिों और ज्यादतियों का बखान जारी रखे-रखे अपना हाथ उठाया की तभी हमारा मोबाइल बज उठा.
 
पडोसी मुल्क़ की कहानियों का पुलिंदा अपनी हलक में सिकोड़ कर हमने अपनी आवाज़ महफूज़ की और कहा “hello !!”
 
दूसरी तरफ से आवाज़ आई “साहब आपका courier है, आप तो घर पर हैं नहीं, आपके पड़ोसियों को दे दूँ?”
 
उस वक़्त जल्दी जल्दी में हमने “हाँ” तो कह दिया पर वापसी में पूरा वक़्त हम अपने पडोसी की शकल और उसका नाम ही याद करने की कोशिश करते रहे.
 
सच कहें तो डर भी रहे थे कहीं वो मुस्लिम भाई ही अपने पड़ोसी न निकलें.
 
(Image Credits: Kai Po Che!)
 
Somya Assorted

One comment on “पड़ोसी

  1. vijayjgajera
    June 28, 2015

    Very well said. Like it.

    Liked by 1 person

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This entry was posted on June 26, 2015 by in Fiction, Hindi and tagged .

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